‘घूसखोर पंडत’ फिल्म को लेकर संत समाज का विरोध तेज, बैन की मांग

‘घूसखोर पंडत’ फिल्म को लेकर संत समाज का विरोध तेज, बैन की मांग

अभिनेता मनोज बाजपेयी की आने वाली फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। फिल्म का टीज़र सामने आने के बाद ब्राह्मण समाज और संत समाज के विभिन्न संगठनों ने कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे समाज विशेष की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला करार दिया है। कई स्थानों पर विरोध-प्रदर्शन भी देखने को मिले हैं।

महामंडलेश्वर स्वामी ज्योतिर्मयानंद ने फिल्म पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस तरह की फिल्मों को तुरंत प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, किसी एक समाज को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करना न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द के लिए भी घातक है। उन्होंने कहा कि आज ब्राह्मण समाज के खिलाफ जिस तरह की भाषा और प्रस्तुतिकरण को सामान्य बनाया जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है।

स्वामी ज्योतिर्मयानंद ने कहा कि ब्राह्मण समाज का भारतीय संस्कृति और सभ्यता के निर्माण में ऐतिहासिक योगदान रहा है। ऐसे में किसी फिल्म के माध्यम से समाज के खिलाफ गलत संदेश देना राष्ट्रहित के विपरीत है।

इस मुद्दे पर गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम ने भी फिल्म के शीर्षक और कथानक पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ‘घूसखोर पंडत’ जैसा नाम अपने आप में अपमानजनक है। घूसखोरी एक गंभीर अपराध है और किसी पूरे समाज को अपराध से जोड़कर दिखाना निंदनीय है। उन्होंने फिल्म निर्माताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की, ताकि भविष्य में कोई भी समाज विशेष को बदनाम करने का प्रयास न करे।

वहीं, आचार्य प्रमोद कृष्णम ने भी पहले इस फिल्म के शीर्षक पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि किसी समुदाय को जानबूझकर निशाना बनाकर फिल्म बनाना सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचाता है। उनके अनुसार, जातियों के नाम पर समाज को बांटने की कोशिशें देश के लिए घातक साबित हो सकती हैं।

इस विवाद पर शिया धर्मगुरु मौलाना सैफ अब्बास ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि किसी धर्म या समुदाय को लक्ष्य बनाकर बनाई जाने वाली फिल्मों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि इस फिल्म पर तुरंत रोक लगाई जाए।

मौलाना सैफ अब्बास ने कहा कि पहले फिल्मों का उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ सकारात्मक सामाजिक संदेश देना होता था, लेकिन अब कुछ लोग केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए विवादित विषयों का सहारा ले रहे हैं। ऐसी फिल्में समाज में भाईचारे को मजबूत करने के बजाय तनाव बढ़ाने का काम कर रही हैं।